मेरे लिए लमही की यात्रा यादगार रहेगी। निमंत्रण सरकारी नहीं व्यक्तिगत था और एक जिज्ञासा थी , यह जगह देखने की।साथ ही यह जानने की कि लमही में किस तरह मुंशी प्रेमचंद जयंती मनाई जाती है। बीती 31 जुलाई 2015 की सुबह पहुँच गया -बनारस , फिर पाण्डेपुर होकर लमही तक. ग्राम के बाहर भव्य द्वार बना था , जिस पर लिखा है , प्रेमचंद पुरी। गाँव में दाखिल होने पर गौ -पालक रहे लेखक मुंशी प्रेमचंद की गौ -माता के लिए सम्मान की भावना को दिखलाती एक गाय की प्रतिकृति के दर्शन हो जाते हैं। ग्राम में अंदर जाते जायेंगे तो गलियां और रास्ते सँकरे लेकिन साफ़ मिलेंगे। लोग सहज ,सरल। मुंशी जी की कहानियों के किरदारों की तरह। लमही उत्सव का आयोजन क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र , वाराणसी और संस्कृति विभाग ने किया था। इसके समानान्तर ग्राम पंचायत की और से
भी कार्यक्रम हो रहा था। इस आयोजन को भी कुछ सरकारी सहयोग मिल जाता है . दरअसल लमही महोत्सव बिलकुल आंचलिक रंग में रंगा था। एक नाटक दल जौनपुर से आया था। मेरे लिए ठेठ बनारसी में मुंशी प्रेमचंद जी की कथाओं के अंश सुनना एक दिलचस्प अनुभव था। इसे काशी की स्थानीय बोली कहें या बनारसी खड़ी बोली , पांच नाटक देखना आनंद दे गया। पंच परमेश्वर , बड़े घर की बेटी ,इस्तीफ़ा , गुल्ली डंडा और सवा सेर गेहूँ। सबसे ज्यादा किसी लेखक की कहानियों की नाट्य प्रस्तुतियाँ देश में हुई हैं तो वे सिर्फ मुंशी जी ही हैं। तो बात हो रही थी , लमही की गलियों की। गाँव में एक चाय की दुकान है , नीबू की खास चाय मिलती है ,दोस्त राजीव गोंड के साथ हम भी पहुँच गए स्वाद लेने , वाही माटी का कुल्हड़ , आधा ताजा नीबू निचोड़कर एक छोटी चुटकी मसाला डाला गया। लमही पहुँचते ही इस पेय के साथ यात्रा की थकान उतर गई। इसके बाद हम ग्राम के चौराहे पर आये , मंच पक्का बना है। यहाँ अब नाटको के मंचन शुरू हो चुके थे। प्रेमचंद निवास की रंगाई -पुताई प्रशासन ने महीना भर पहले करवा दी थी। यहाँ चित्र प्रदर्शनी भी लगी थी। एक नाटक यहाँ भी देखा। सबसे ज्यादा रंग भूमि के अंश मातृभूमि के किरदारों ने आनंद दिलवाया। खांटी स्थानीय शैली थी और दुखिया जैसे पात्र ने तो अभिनय की ऊंचाइयों को छुआ। यह मुंशी प्रेमचंद के साहित्य के दलित पात्रों की तरह बिलकुल वास्तविक स्वरुप में देखने को मिला। जिन लोगों से लमही में मुलाकात हुई उनमें लोक गायक श्री हीरालाल यादव , डॉ राम सुधार सिंह और संस्कृति विभाग के अफसर डॉ रत्नेश वर्मा शामिल थे । लोक कला संस्थान ने बहुत दिन तक इस आयोजन की तैयारियां की होंगी। दोपहर बाद बनारस हिन्दू विश्विद्यालय की संगोष्ठी में करीब एक घंटे तक व्याख्यान सुने। मुंशी प्रेमचंद के दो बेटों के बारे में दुनिया जानती है। उनकी इकलौती बेटी का विवरण मुझसे सुनकर लोग चकित थे। वर्ष 1986 में सागर के उस यादगार साक्षात्कार को सुनकर सभी सुखद हैरत में पड़ जाते हैं ,जो कमला देवी जी से लिया था। पिता की सभी कृतियाँ पढ़ने वाली कमला जी ने 85 की अवस्था मे गुड़ गाँव में शरीर त्यागा था वर्ष 1999 में । यदि वे जीवित होती तो इस साल सौंवा जन्म दिवस मनातीं। राय परिवार ( प्रेमचंद जी के कुटुम्ब का यही उपनाम है ) में अभी श्री केके राय सबसे ज्यादा आयु ( 95) के हैं जो जीवित हैं। लमही में ही रहते हैं। मुंशी जी के भतीजे हैं। मुंशी जी की बिटिया कमला जी 1929 में मध्य प्रदेश के सागर जिले के देवरी कसबे में श्री वासुदेव श्रीवास्तव से ब्याही थी . बाद में यह परिवार सागर आकर बस गया था। मुंशी जी सागर कुल चार बार आए -1929 से 1936 के मध्य।
भी कार्यक्रम हो रहा था। इस आयोजन को भी कुछ सरकारी सहयोग मिल जाता है . दरअसल लमही महोत्सव बिलकुल आंचलिक रंग में रंगा था। एक नाटक दल जौनपुर से आया था। मेरे लिए ठेठ बनारसी में मुंशी प्रेमचंद जी की कथाओं के अंश सुनना एक दिलचस्प अनुभव था। इसे काशी की स्थानीय बोली कहें या बनारसी खड़ी बोली , पांच नाटक देखना आनंद दे गया। पंच परमेश्वर , बड़े घर की बेटी ,इस्तीफ़ा , गुल्ली डंडा और सवा सेर गेहूँ। सबसे ज्यादा किसी लेखक की कहानियों की नाट्य प्रस्तुतियाँ देश में हुई हैं तो वे सिर्फ मुंशी जी ही हैं। तो बात हो रही थी , लमही की गलियों की। गाँव में एक चाय की दुकान है , नीबू की खास चाय मिलती है ,दोस्त राजीव गोंड के साथ हम भी पहुँच गए स्वाद लेने , वाही माटी का कुल्हड़ , आधा ताजा नीबू निचोड़कर एक छोटी चुटकी मसाला डाला गया। लमही पहुँचते ही इस पेय के साथ यात्रा की थकान उतर गई। इसके बाद हम ग्राम के चौराहे पर आये , मंच पक्का बना है। यहाँ अब नाटको के मंचन शुरू हो चुके थे। प्रेमचंद निवास की रंगाई -पुताई प्रशासन ने महीना भर पहले करवा दी थी। यहाँ चित्र प्रदर्शनी भी लगी थी। एक नाटक यहाँ भी देखा। सबसे ज्यादा रंग भूमि के अंश मातृभूमि के किरदारों ने आनंद दिलवाया। खांटी स्थानीय शैली थी और दुखिया जैसे पात्र ने तो अभिनय की ऊंचाइयों को छुआ। यह मुंशी प्रेमचंद के साहित्य के दलित पात्रों की तरह बिलकुल वास्तविक स्वरुप में देखने को मिला। जिन लोगों से लमही में मुलाकात हुई उनमें लोक गायक श्री हीरालाल यादव , डॉ राम सुधार सिंह और संस्कृति विभाग के अफसर डॉ रत्नेश वर्मा शामिल थे । लोक कला संस्थान ने बहुत दिन तक इस आयोजन की तैयारियां की होंगी। दोपहर बाद बनारस हिन्दू विश्विद्यालय की संगोष्ठी में करीब एक घंटे तक व्याख्यान सुने। मुंशी प्रेमचंद के दो बेटों के बारे में दुनिया जानती है। उनकी इकलौती बेटी का विवरण मुझसे सुनकर लोग चकित थे। वर्ष 1986 में सागर के उस यादगार साक्षात्कार को सुनकर सभी सुखद हैरत में पड़ जाते हैं ,जो कमला देवी जी से लिया था। पिता की सभी कृतियाँ पढ़ने वाली कमला जी ने 85 की अवस्था मे गुड़ गाँव में शरीर त्यागा था वर्ष 1999 में । यदि वे जीवित होती तो इस साल सौंवा जन्म दिवस मनातीं। राय परिवार ( प्रेमचंद जी के कुटुम्ब का यही उपनाम है ) में अभी श्री केके राय सबसे ज्यादा आयु ( 95) के हैं जो जीवित हैं। लमही में ही रहते हैं। मुंशी जी के भतीजे हैं। मुंशी जी की बिटिया कमला जी 1929 में मध्य प्रदेश के सागर जिले के देवरी कसबे में श्री वासुदेव श्रीवास्तव से ब्याही थी . बाद में यह परिवार सागर आकर बस गया था। मुंशी जी सागर कुल चार बार आए -1929 से 1936 के मध्य।
0 अशोक मनवानी

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