Thursday, March 31, 2016



आज से 25
बरस पहले जब भोपाल के आसपास अपनी ड्यूटी के दौरान अनेक जगहें देखने को मिलीं तब तरक्की की ध्वनि सुनते हुए, हो रहे बदलावों को भी देखा। फिर बरेली में पत्रकारिता कार्यशाला के दौरान युवा पत्रकारों को उसी अनुभव के आधार पर फीचर लेखन के विषय भी सुझाए थे। आज 1994 का वो कागज हाथ लगा , ये हैं - मेरे उस वक्त के पसंदीदा विषय।

रायसेन के किले से दिखता है भोपाल, साँची के स्तूप: पत्थरों पर उत्कीर्ण इतिहास, भोजपुर शिव-मंदिर - भक्तों और पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र, आशापुरी का अनोखा पुरातत्व संग्रहालय, बोरास घाट: मध्यप्रदेश का जलियांवाला बाग, भीम बैठका की शैलचित्र- पहाड़ियों का जादू, होली पर्व पर लगने वाला अनोखा बीरबम्बोल का मेला, सिलवानी अंचल की मड़ई: ग्रामीणों का उत्सव , बारला की कलात्मक पर्वत ऋंखलाएं , बेगमगंज के पास अद्वितीय नदियों का संगम , पारतलाई साक्षर कैसे बना , साढ़े बारह गांव में लोक रीतियां, सैलानियों को लुभाता-रातापानी अभ्यारण्य, रायसेन की अमूल्य वन संपदा , नीलकंठेश्वर (हरदौट) का मंदिर, माता परवलिया का आकर्षण मेला, चौकीगढ़ किले की दीवारों में छिपा अतीत , हिंगलाज माँ का मंदिर, प्रमुख आस्था केंद्र, रायसेन - दरगाह शरीफ- सांप्रदायिक सदभाव का प्रतीक स्थल, चिकलोद क्षेत्र में आते हैं हर बरस मेहमान पक्षी , सतधारा, सोनारी के बौद्ध स्तूप सांची से कम नहीं, पीपलखिरिया: रायसेन के निकट एक नए मंडीदीप की तैयारी , चिड़ियां टोल: वर्षाकाल में भीड़ जुटाता पर्यटक स्थल , पैनीगंवा:आज भी जहां मनुष्य आदिमयुग की तरह चट्टानों और टोल में रहता है , पतई घाट: पुण्य सलिला नर्मदा का महत्वपूर्ण घाट , केवलाझिर : जहां आजाद हिंद फौज के बुजुर्ग सैनिक रहते हैं, रायसेन में बसा छोटा-मोटा केरल ईंटखेड़ी, नरवर की काष्ठ कला, बाड़ी का नवेदय विद्यालय- शिक्षा में नया प्रयोग , नीलगढ़ में सामाजिक परिवर्तन, बैलगाड़ी दौड़ - ग्रामीण खेलों में लोक रुचि की प्रतीक, मंडीदीप: जहां सुई से लेकर टेलीफोन उपकरण बनते हैं , रायसेन जिले के पत्थर क्रेशर श्रमिकों की सामाजिक -आर्थिक दशा, सांचेत की सरौतियों की बात है निराली, बहावलपुरी समुदाय का सामाजिक अध्ययन , बारना की सिंचाई से जिंदगी हुई खुशहाल, सीतातलाई की पहाड़ी - एक संभावना से भरपूर पर्यटन स्थल, देवरी के पान लबों की शान, जामगढ़ की दुर्लभ पुरा संपदा , और मध्यप्रदेश का प्रथम पर्यटन जिला रायसेन।

Thursday, January 21, 2016

भोपाल शहर में अनेक स्थानों  पर शहीद हेमू कालानी  के बलिदान दिवस पर उनको श्रद्धांजलि देते हुए उनके बलिदान को  याद किया गया। भोपाल के कुछ   युवा उनके जीवन पर आधारित नाटक में  शहीद की भूमिका भी  निभा चुके हैं। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन  के इस   अमर शहीद के  सगे  छोटे भाई  के मुंह से  भी   एक अवसर पर हेमू की शहादत की दास्ताँ  मैंने सुनी है। आज भी मुंबई में इस कालानी परिवार से मिलकर अहसास होता है कि यह गौरन्वान्वित  कालानी परिवार किस तरह समाज सेवा के मार्ग का अनुसरण कर रहा है। यह बहुत कम  लोगों  को जानकारी है कि  भारत की स्वतंत्रता के लिए शहीद अनेक नौजवानों  के निकट परिजन आज भी बेहद सादी  जिंदगी जीते हैं। ऐसे परिवार सरकार से किसी सहायता की आशा नहीं करते। इन परिवारों  को आज भी नाज़  है कि  उनके परिवार से कोई नौजवान देश की आजादी के लिए शहीद हुआ।  मुंबई के चेम्बूर इलाके में ऐसा ही एक परिवार है - कालानी परिवार जिसे कभी भी  अवसरों  पर शासन के प्रतिष्ठापूर्ण कार्यक्रमों में आमंत्रित नहीं  किया जाता। महाराष्ट्र सरकार  क्या इन परिवारों  को कम से कम साल में सिर्फ दो दिन गणतंत्र दिवस और आजादी की सालगिरह के दिन ही सही  सम्मान देगी ? मध्य प्रदेश  में ऐसी परम्परा है। मैंने गत सितम्बर महीने में इमुंबई में कालानी  परिवार से भेंट की। हम   इतिहास  के पन्ने  पलटें  तो ज्ञात होगा कि  किस तरह ब्रिटिश सरकार ने युवा क्रन्तिकारी हेमू कालानी को 21   जनवरी    1943  को सिंध प्रान्त के सक्खर  कारावास  में फांसी पर लटका दिया था। तब हेमू की  आयु सिर्फ उन्नीस वर्ष थी। उस कालखण्ड को याद करते हुए हेमू के छोटे भाई श्री टेकचंद कालानी (बयासी बरस  ) और उनकी पत्नी श्रीमती कमला कालानी  बताते हैं कि   हेमू भैया बचपन से क्रांन्तिकारी गतिविधियों  में शामिल रहे।  इन कार्यो की घर पर  भी पूरी जानकारी  नहीं देते थे। वे शहीद  भगत सिंह की शहादत से छोटी उम्र से ही  प्रभावित थे। अंग्रेजों  के लिए मन में तीव्र क्रोध था जो अकसर  बातचीत में जाहिर होता था। एक दिन एक रेलगाड़ी  के  फौजी साजो सामान लिए  बलूचिस्तान के क्वेटा के लिए जाने की बात पता चलते ही हेमू कुछ साथियों  के साथ  रेलगाड़ी पलटने की योजना बनाकर घर से निकले। यह रेलगाड़ी 23  अक्टूबर 1942  को निकलनी थी ,तय समय पर साहसी देशभक्तों  की मण्डली चल पड़ी सर पर कफ़न बांधे।  उस दिन हेमू बहुत बैचैन थे।  गोरे  सत्ताईयों  के लिए नफरत का भाव था हेमू के मन में। अक्सर परिवार में भी उनकी ऐसी अभिव्यक्ति सुनने को मिलती रहती थी। उस दिन घटना को अंजाम देने के लिए चल पड़े देश के दीवाने। रेल पटरियों के पास पटरियां उखाड़ने के पहले एक सिपाही की नजर अचानक ही  इन देशप्रेमियों नौजवानों  पर पड़  जाती है । फिर मचता  है  सिपाहियों का  खूब शोर और दूसरे सिपाही भी तत्काल वहां आ पहुंचते हैं । श्री टेकचंद जी कुछ पल रूककर अपनी बात आगे बढ़ाते हैं।  वृतांत बताते उनकी आँखें  नम  हो जाती हैं। वे बताते हैं कि  सिपाही नजदीक आते हैं और हेमू अपने दोस्तों को वहां से निकल जाने का इशारा करते हैं। खुद अकेले ही खुद को सिपाहियों के हवाले कर देते हैं।   फिर हेमू  को  जेल में डाल  दिया जाता है । मुकदमा चलता है  और अंततःउन्हें मृत्यु दंड का फैसला सुनाया जाता है । कोर्ट के उस फैसले से हेमू  बिलकुल भी व्यथित नहीं थे। उनके आखिरी शब्द थे -आप लोग मेरी मौत पर रोना नहीं ,मैं पुनर्जन्म लूंगा ,हमारा देश जल्द ही आजाद हो रहा है। टेकचंद जी ने यह भी बताया कि  जेल में अनेक यातनाएं  सहने के बाद भी हेमू का वजन बढ़ गया था ,मतलब उनको नजदीक आ रही मौत की घड़ी  से लेश मात्र भी भय नहीं था। हेमू से जब कभी परिवार के लोग उसके विवाह की बात करते ,हेमू बात को टाल  देते ,कहते "करूँगा शादी और आप लोग देखना कि  कितने सारे लोग आएंगे मेरी शादी में। "  टेकचंद जी  यह बात बताते बहुत भावुक हो जाते हैं।  कुछ पल खामोश रहने के पश्चात टेकचंद जी कहते हैं "हम जीकर  भी हार गए ,भाऊ  मरकर भी अमर हो गए।"  कुछ  मिनिट के विराम के बाद आखिरी में टेकचंद जी कहते हैं हम गौरवान्वित हैं कि   देश में संसद सहित अनेक    शहरों  में हेमू की प्रतिमा स्थापित है ,उनके नाम पर संस्थाओं  के नाम भी रखे गए  हैं  और अनेक लोग घरों  में बच्चों  का नाम हेमू रखते हैं। हेमू को सदियाँ  याद रखेंगी। मुम्बई में  चेम्बूर में हेमू कालानी कालेज के संचालन  के साथ ही कालानी परिवार गरीब़ों को भोजन करवाने और आयुर्वेद के प्रचार जैसे काम कर रहा है . अनेक इतिहासकार और उस दौर के स्वतंत्रता सेनानी   बताते हैं जब  हेमू  को  जेल में डाल  दिया गया और उन पर ब्रिटिश सत्ता को उखाड़ने का षड्यंत्र रचने का  मुकदमा चला और बाद  में फिर उन्हें जब फांसी देने का निर्णय सुनाया गया तब  भी  हेमू  तनिक भी विचलित  नहीं थे।  हेमू की अंतिम यात्रा में उनकी क़ुरबानी को सम्मान देते हुए  सक्खर  शहर  की सड़कें लोगो से पट  गई  थीं। उस दिन सिर्फ सड़कें   सिर्फ  स्वतंत्रता प्रेमियों से भरी हुईं  थीं. जब हेमू की अर्थी उठी तो मानो  शहीद की बारात चली हो ,जैसा हेमू  इसी अंतिम यात्रा को बारात की संज्ञा  देते हुए  अपनी भावनाएं व्यक्त किया  करते थे। आज हम ऐसे शहीदों  की बदौलत आजाद हैं। नेत्र नम  हो जाते हैं  ऐसे वीरों  को याद करते हुए। 
० अशोक मनवानी

Tuesday, January 12, 2016

एक सुनहरे दौर का चला जाना पच्चीस  दिसम्बर  के दिन सुबह ये खबर आई  कि  मुंबई में वरिष्ठ अदाकारा साधना जी नहीं रहीं।  एक पल को यकीन ही नहीं हुआ।  उन्हें कोई कैंसर नहीं था , जैसा अधिकांश टी वी चैनल बताते रहे।  मैं  साधना जी पर किताब लिखने के सिलसिले में उनसे जब भी मिला , भले कुछ क्षण मिले हों बातचीत के, हमेशा खुश और पॉजिटिव - ऊर्जा से ओत - प्रोत देखा। आम तौर  पर वे परिचित , निकट रिश्तेदारों  और खास प्रशंसकों से ही मिलती थीं। मैंने ट्रेन  से तुरंत भोपाल से  मुंबई रवाना होने का कार्यक्रम बना लिया , रिजर्वेशन न मिलने पर सोलह घंटे लम्बी बस यात्रा का विकल्प चुनना पड़ा।  शनिवार की सुबह  सांताक्रुज के राम कृष्ण  मार्ग के संगीता नामक  बंगले के ग्राउंड फ्लोर  बी - वन पहुँच गया। दिवंगत अभिनेत्री साधना जी के निवास पर सांताक्रुज इलाके में ऐसी भीड़ पहले कभी नहीं देखी  गई। साधना जी चूँकि कभी जनता के बीच नहीं आती थीं  इसलिए शायद उनके दीदार को तरसते उनके प्रशंसक बहुत   बेचैन और बेताब थे। व्यवस्था देख रही शाइना एन सी  और लोकल पुलिस किसी तरह उस हुजूम को समझाने  और उनके घर के भीतर आने से रोकने में लगे थे।  यहाँ  से ग्यारह बजे साधना जी की आखिरी यात्रा  निकली। अर्थी पर लेटी साधना जी का चेहरा उसी साधना कट हेयर स्टाइल के साथ दिखाई दिया , आँखों पर चश्मा चढ़ा था। एक जिंदगी  पूरी। एक अलग दुनिया की यात्रा के लिए तैयार।  देश - विदेश में जिसने हिंदी सिनेमा में लगातार अपनी विशेष स्थिति बनाकर  करोड़ों  प्रशंसक पैदा किए।  दस फैशन चलाए। सिर्फ साधना कट नहीं।  जान लीजिए नौ और फैशन  -  आँखों में तिरछा  काजल , शरारा , गरारा , टाइट और बिना बाहों वाला कुरता , चूड़ीदार सलवार या पायजामा , कानों में बड़े बाले , गले  में दुपट्टा ,   बालों  के आकर्षक जूड़े और सबसे खास उनकी सौम्य मुस्कान। याद दिलाएं आपको कि  एक मुसाफिर एक हसीना और वो कौन थी  जैसी फिल्मो की  लोकप्रियता का यह आलम था कि उस समय की  कॉलेज गर्ल्स  ने हंसना छोड़ दिया था , बस हल्की  मुस्कान चेहरों पर होती थी।  भारतीय सिनेमा का अहम दौर  रहा  साधना जी जैसी अभिनेत्रियों  की वजह से।  लता जी मानती हैं कि  साधना की तरह कई अहिन्दी भाषी अदाकाराओं का हिंदी  उच्चारण अद्भुत था।  राष्ट्रभाषा के लिए  उनका प्रेम प्रशंसनीय है। 
साधना जी के  शव वाहन  के पीछे गाड़ियों की लम्बी कतार  थी।  एक. दो टी वी चैनल्स  जो बता रहे थे की बॉलीवुड की कोई बड़ी हस्ती साधना जी के अंतिम दर्शन को नहीं पहुंची , यह असत्य था।  वेटेरन एक्टर संजय खान , संवाद लेखक निर्माता  सलीम खान ,  फिल्म इंतकाम और एक फूल दो माली में साधना जी के नायक रहे संजय खान ,  चरित्र अभिनेता   और साधना जी के  ख़ास प्रशंसक रजा  मुराद , काबिल गायक , द्घोषक , अभिनेता   अन्नू कपूर   प्रसिद्द कोरियोग्राफर  सरोज खान जिन्हें  पहली बार साधना जी ने गीता मेरा नाम फिल्म बनाने पर बतौर कोरियोग्राफर सम्मानित किया , पूर्व मिस इंडिया  पूनम चंदीरमानी  सिन्हा (  शत्रुघ्न  सिन्हा जी की पत्नी और पूर्व मिस इंडिया  ) साधना जी के नजदीकी श्री सुरेश लालवानी , रमेश सिप्पी जो पहले  बतौर  निज सहायक भी कुछ समय काम कर चुके हैं , आने- जाने वालों   से बात करते हुए सक्रिय  थे। इस बीच वेटेरन एक्ट्रेस और साधना जी की सहेली वहीदा रहमान और आशा पारेख जी भी आती  हैं - बेहद ग़मगीन थीं  दोनों।  मुझे  एक सिने प्रेमी  धर्मेन्द्र पाठक  भी मिले जो अहमदाबाद खास तौर  पर आए  थे , वे शांत और मायूस मेरे पास बैठे थे। मुंबई के ओशिवारा में जहां  हिन्दू शमशान भूमि  का बोर्ड लगा हुआ था,  शमशान घाट की बाऊन्ड्री  वॉल  के बाहर  ही टी वी वालों  ने ओबी वेन्स लगा रखी थीं। अंत्येष्टि की रस्म के लिए  रिश्तदारों में  साधना जी के दिवंगत पति आर के नैयर  के भाई केवल नैयर , भतीजी  गीता  साधना जी की शिमला निवासी ननद सोनिया , साधना जी के कसिन   विजय भावनानी उनके बेटे  यशीष  भावनानी मौजूद थे।  वहीं   जानी मानी उद्घोषिका तबस्सुम , करण  जौहर की माँ श्रीमती हीरू जौहर   लघु  फिल्म निर्माता टी मनवानी आनंद, बीते दौर की अभिनेत्री शम्मी , दीप्ति  नवल  आदि मौजूद थे। पंडित जी मन्त्र आदि पढ़े।  आधा घंटे के बाद  अपने दौर की इस विलक्षण अभिनेत्री का पार्थिव शरीर विद्युत  शव दाह  कक्ष में ले जाया जाता है।  सभी मौजूद लोगों  की आँखों से आसुंओ की धारा बह  निकलती है। बाद में साधना जी के  बंगले  पर  फिर से  हेलेन जी और सारिका और अन्य कई अभिनेत्रियों का आना- जाना लगा रहता है।  मैं नम आंखों से लौटता हूं । साधना जी के दौर को याद करते हुए । साधना जी को मरणोपरांत ही सही पद्म श्री या पद्म भूषण दिया जाना चाहिए। उनके अभिनय के क्षेत्र में  अप्रतिम योगदान और  नए प्रतिमान रचकर फिल्म उद्योग की दिशा बदलने के लिए। 
०अशोक मनवानी । 

Thursday, December 24, 2015

sadhna ji

Tuesday, December 15, 2015

              मास्टर चन्दर


·       15 दिसंबर 1907 को सिंध के ठारुशाह में जन्म .
·       पिता - श्री आसनदास जमींदार थे । बचपन से संगीत से लगाव रहा । उन्हें चाचाजी ने कलकत्ता से हारमोनियम खरीद कर   दिया ।
·        एक दिन संत कंवरराम जो महान गायक और समाजसुधारक थे, मास्टर चंदर की प्रस्तुति देखी और भविष्यवाणी की कि यह बालक एक दिन प्रख्यात गायक बनेगा ।
·        वर्ष 1932 में मास्टर चंदर का प्रथम रिकार्ड "" सुहिणा अर्ज आहे "" के नाम से आया ।
·       मास्टर चंदर ने जीवन में करीब 50 वर्ष गायकी को दिए । उन्होंने हिंदी और सिंधी फिल्मों में अभिनय भी किया । उन्होंने हिंदी फिल्म दिलारम और मौत का तूफान में अभिनय भी किया । बहुत कम होगों को जानकारी होगी फिल्म अछूत कन्या के लिए अभिनेत्री देविका रानी के अपोजिट मास्टर चंदर का चयन किया गया था  । बाद में यह भूमिका अशोक कुमार को मिल गई । मास्टर चंदर एक अच्छे कवि  और संगीत निर्देशक भी थे । उन्होंने उस दौर के प्रमुख गायकों भगत कंवरराम के अलावा स्वामी कुंदन , जीवन भाई ,  अल्लाहरक्खी , भगत मोहन, जारोभगत आदि के साथ गायन किया । मास्टर चंदर बहुत लोकप्रिय रहे और उनके कुछ गीत तो आज भी ऐसे बच्चे गाते हुए मिलते हैं जिन्होंने न कभी मास्टर चंदर को देखा होगा न ही उनके अभिनय से परिचत होगा ।
      यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि एचएमवी कंपनी के इतिहास में 7 प्रतिशत की रायल्टी लेने वाले मास्टर चंदर प्रथम गायक थे वरना कंपनी ने किसी को 5 प्रतिशत से अधिक रायल्टी नहीं दी थी । मास्टर चंदर देश विभाजन के बाद मुम्बई में आ बसे । उन्होंने वर्ष 1955 में एक विशेष गायन कार्यक्रम भी प्रस्तुत  किया ।  अपने लोक प्रिय होने के कारण वे दो देशों के मध्य सेतु बने रहे । 1960 और 1970 के दशक में उन्होंने विश्व के कई देशों में प्रस्तुतियां दी । वर्ष 1984 की 3 नवंबर की तारीख को मास्टर चंदर ने आखिरी सांस ली । उनके दो बेटे महेश चंदर और गोप चंदर  भी गायन से बहुत सक्रियता से जुड़े । मास्टर चंदर की 9 पुस्तकें प्रकाशित हैं जो उनके संगीत गुरु काका जीवतराम   मटाई , शाह साहब संगीत और लोक संगीत और आध्यात्मिक विषयों पर आधारित हैं । एक नन्हीं बालिका की कहानी को उस दौर में गाकर मास्टर चंदर ने महिला सशक्तिकरण के लिए उपयुक्त वातावरण बनाया जो बहुत दुर्लभ बात है । 

Friday, November 13, 2015

is diwali sirf ek phuljhadi jalayee.ek mitr ne chetaya ki pashu -pakshi bahut aahat hote hain in aawajo se.kuchh asar hota hai kisi ke kahne ka.

Saturday, November 7, 2015

वर्ष 1999 में सिंधी और 2014  में हिंदी कहानी संकलन। दोनों का नाम मौजूदगी। वही आवरण पृष्ठ। जयपुर में ख्यात सिंधी लेखकों  से करवाया था विमोचन। संयोग यह कि  पहले अजमेर में कथाकार श्री लखमी  खिलानी ने दादा कीरत बाबाणी  के साथ किया था विमोचन। प्रकाशक भी पुराने मित्र ज्ञान लालवाणी हैं। अधिकांश   पाठक जरूर अलग। 

Friday, November 6, 2015

मुंशी प्रेमचंद जयंती पर एक कार्यक्रम में लमही जाना हुआ जो बनारस शहर से लगा हुआ गांव  है .report
 डॉ नारायण  सामताणी जी बनारस में रहते हैं। कुछ माह पहले भेंट हुई। बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में बौद्ध अध्ययन विभाग से सेवानृवित्त  हैं। उन्होंने  संस्कृत को  पाली से अलग किया। अलग विभाग बना। आज भी 93  की आयु में मस्तिष्क गतिमान है। दादा को अमेरिका से आमंत्रण आते हैं। व्याख्यान और शोध निर्देशन के लिए.



डॉ नारायण सामताणी के साथ    बनारस में एक मुलाकात की तस्वीर 
31  जुलाई 2015





















 हार्दिक शुभकामनाएं। 

Tuesday, October 13, 2015

माउंटनमैन  मांझी  की भावना
नवरात्रि  पर्व  पर अनेक प्रख्यात मंदिर जनता की श्रद्धा के केंद्र होते हैं। यहाँ इंतजाम भी जरुरी हो जाते हैं , खासकर जब पहले  कोई  हादसा हुआ हो , तब प्रशासन की पहली प्राथमिकता  यही होती है कि श्रद्धालुओं को तकलीफ न हो , ऐसी व्यवस्थाएं कर ली जाएँ। दतिया जिले के रतनगढ़  में बहुत कम समय में प्रशासन ने रास्ता चौड़ा और सुविधाजनक बनवाने में कामयाबी हासिल की है। यह कहना शायद अतिश्योक्ति हो  लेकिन सच भी है कि यह काम लगभग उसी तरह का है जिस तरह अकेले मांझी ने बिहार में आम जन  की सहूलियत के लिए बरसों  पहले अपनी मेहनत  से  सुगम मार्ग निर्मित कर लिया था।  भले प्रशासन की इतनी तारीफ करना किसी को उचित न लगे लेकिन   यह तो कह ही सकते हैं   कि आज सभी साधनों  का इस्तेमाल कर प्रशासन ने  माउंटनमैन  मांझी  की भावना से काम किया है। मैंने कल (12 october 2015 ) रतनगढ़ जाकर  माता के दर पर माथा टेका और साक्षी बना  शानदार इंतजामों का ।  0 अशोक मनवानी 

Tuesday, September 29, 2015

लघुकथाचमक

उन्होंने प्रोविडेंट फंड की पूरी राशि निकालकर ,बैंक लोन का पैसा मिलाकर बड़े जतन से मकान बनवाया .मकान के शुभारम्भ के दिन तक वे परिवार के सदस्यों और नौकरों -चाकरों
के साथ नए मकान की दीवारों ,खिडकियों और दरवाजों को चमकाते रहे।
हालाँकि छह साल लगातार चले मकान के काम के कारण उनके चेहरे की चमक चली गयी थी।
अशोक मनवानी
लघु कथा 

बुक शेल्फ 
घर में लंबी -चौड़ी बुक शेल्फऔर उसमे सजी किताबें देखकर आगंतुक हैरत करते ,क्या कमाल की बात है ,इतनी क़िताबे ?सच आपने गजब की लाइब्रेरी बनाई है,रोज पढ़ते होंगे ?
घर मालिक जवाब देते हैं - अरे नहीं भाई,इतना समय किसको है ? दरअसल यह इन्टीरियर डेकोरेशन के लिए बहुत उपयोगी वस्तु है .पढ़ने के लिए कौन वक्त गँवाए ? आप मेरी व्यस्तता जानते ही हैं।ये लाभ जरुर है कि बुक शेल्फ देखने वाले बढ़िया आतंकित हो जाते हैं।
मिथ्या -मंजिल -2005
लघुकथा
वेलकम -वेलकम
बात -बात में ओढ़ी हुई विनम्रता के साथ भैया जी "वेलकम -वेलकम "कहने के आदी थे. 
किसी भी जगह ,किसी भी मौके पर मित्रो से मिलते ही वे पूरी ताकत लगा कर हाथ मिलाते और आदत के मुताबिक़ कहते थे "वेलकम -वेलकम .
आईये सर स्वागत है आपका "
भैया जी से आज गलती यह हो गयी ,उन्होंने विश्राम घाट में शोकाकुल परिवार के एक व्यक्ति को ही यह तकिया कलाम सूना दिया ,वह भी एक बार नहीं ,तीन -चार बार .एक साथ 4 - 6 लोगो ने उनकी इस हरकत के लिए उन्हें खूब खरी -खोटी सुनायी और उपदेश सुनाये सो अलग. गनीमत थी ,भैया जी की बस धुनाई नहीं हुई,लेकिन आज उन्हें इतना अहसास हो गया ,हर जगह नहीं बोलना चाहिए इस तरह -
"वेलकम- वेलकम."
( लघु कथा संग्रह मिथ्या -मंजिल से ,प्रकाशन वर्ष -2005)
लघु कथा 
स्वदेशी अभियान 
शहर के अनेक समाजसेवी आज एक पांच सितारा होटल में मिले। आज का विषय था -खाना खाने के पहले कोई संकल्प भी लिया जाये।अनेक सामाजिक कुरीतियों पर बातचीत हुई। तय यह हुआ कि अब कोई नया विषय चुना जाए। विदेशी वस्तुओ के अधिक इस्तेमाल से शुरू बहस का समापन इस फैसले से हुआ कि आने वाला महीना स्वदेशी अभियान को समर्पित हो और जोर- शोर से यह अभियान संचालित किया जाये। शुद्ध स्वदेशी का प्रचार- प्रसार हो । बस फिर क्या था -अगले हफ्ते होने वाली पार्टी का स्थान एक वनवासी इलाके का पारंपरिक रेस्ट हाउस था। दारू भी देसी थी और मुर्गा भी देसी। समाजसेवियों ने स्वदेशी को ही अपनाया।
लेखक -अशोक मनवानी
आगामी वर्ष से सप्रे संग्रहालय में होगा स्व देवलिया स्मृति आयोजन
स्मृति ग्रन्थ का प्रकाशन भी होगा 

गोष्ठी में समकालीन पत्रकार,मित्र ,शिष्य और प्रशंसक एकत्र हुए 


भोपाल 27 नवम्बर 2012/स्वराज भवन सभागार में सोमवार को स्व भुवन भूषण देवलिया की 21 वी पुण्यतिथि पर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण किया गया .अनेक वक्ताओ ने देवलिया जी के मानवीय गुणों और पत्रकारीय प्रतिबध्ताओ को याद किया। इस अवसर पर निर्णय लिया गया कि स्व देवलिया (1937-1991)
के योगदान को रेखांकित करने वाले ग्रन्थ का प्रकाशन शीघ्र किया जायेगा। वरिष्ठ पत्रकार पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर ने कहा कि आने वाले वर्ष से माधव राव सप्रे संग्रहालय में स्व देवलिया स्मृति आयोजन होगा। उल्लेखनीय है कि देवलिया जी मध्य प्रदेश आंचलिक पत्रकार संघ के प्रथम अध्यक्ष भी रहे हैं। पत्रकारिता से जुड़े ऐसे लोग जिन्होंने राष्ट्रीय सरोकारों से गहरा वास्ता रखते हुए कई नौजवान कलमकारों को प्रेरित ,प्रोत्साहित करने का अनूठा कार्य किया,उनमे स्वर्गीय भुवन भूषण देवलिया का नाम बेहद सम्मान से लिया जाता है। सागर में रहकर देवलिया जी ने जहाँ विश्वविद्यालय के पत्रकारिता के प्राध्यापक रहते हुए विद्यार्थियों को शिक्षित -दीक्षित किया वहीं देशबन्धु ,यूनीवार्ता ,आकाशवाणी और अन्य अनेक संस्थानों को सेवाएँ प्रदान की।उनकी पुण्यतिथि 26 नवम्बर पर अनेक वक्ताओ ने उन्हें श्रधा सुमन अर्पित किए .प्रमुख रूप से राष्ट्रीय एकता परिषद् के उपाध्यक्ष श्री रमेश शर्मा ,श्री राजेश सिरोठिया ,पुष्पेन्द्रपाल सिंह,सुश्री दविंदर कौर उप्पल ,अजय त्रिपाठी, आलोक सिंघई,रामशरण पाराशर ,प्रशांत जैन,प्रदीप पाठक ने यादे ताजा की . आयोजन में श्री पलाश सुरजन ,श्री चंद्रहास शुक्ल ,श्री सतीश एलिया , डॉ अर्पणा ,स्व देवलिया की धर्म पत्नी श्रीमती कीर्ति देवलिया,पुत्र आशीष देवलिया,अरुणा दुबे ,बी के दुबे और देवलिया परिवार के अनेक सदस्य मौजूद रहे। nov.2012

Monday, September 28, 2015

लता होने का अर्थ


86  वीं जन्म वर्षगांठ   28 sept. 2015
                                                                                                                                                    
मध्य प्रदेश के इंदौर में 28 सितम्बर 1929  को जन्मी हिन्दी फ़िल्मों की मशहूर पार्श्वगायिका  लता मंगेशकर   ने फिल्मी और गैर फिल्मी मिलाकर   हजारों  गीत  गाये हैं.इनकी आवाज़ के प्रशंसक पूरी दुनिया में फैले हुए हैं। लता जी की विशेषता है कि इन्होंने शास्त्रीय संगीत, गजल और पॉप संगीत हर क्षेत्र में अपनी आवाज़ का जादू बिखेरा है और एक समान सफलता पाई है।
 हिंदी सिनेमा  के अनेक लोकप्रिय  गीतों के लिए लता  जी को जाना जाता है. इन गीतों में   -तेरे सुर और मेरे गीत …. ,घर आया मेरा परदेसी … , यूं  हसरतों के दाग … ,ये जिन्दगी उसी की है … ,धीरे धीरे मचल  ऐ  दिले … ,ना कोई उमंग है … ,ओ मेरे सनम ओ मेरे सनम … ,आज हम अपनी दुआओं  का असर … ,दिल अपना और प्रीत परायी … ,लाख छुपाओ छुप न सकेगा … ,ये हरियाली और ये रास्ता … , ढूंढो  ढूंढो  रे साजना ….  झिलमिल  सितारों  का आंगन होगा … ,मुझको इस रात  की तन्हाई में आवाज न दो … फूल तुम्हें  भेजा  है ख़त में … ,मेरे महबूब तुझे मेरी मोहब्बत की कसम … तू जहाँ -जहाँ चलेगा … आएगा ,आएगा … आने वाला   … ,मोहब्बत की झूठी कहानी पर … जाने क्यों लोग मोहब्बत किया … जोत से जोत जगाते … ,हवा में उड़ता जाये … हँसता हुआ नूरानी चेहरा … ,जिन्दगी भर नहीं भूलेंगे … मोहे भूल गए सांवरिया … ज्योति कलश  छलके … नगरी नगरी … गाता  जाये  बंजारा …. कहीं  दीप  जले कहीं दिल … ओ सजना बरखा बहार आई … लो आ गयी उनकी याद … मेरा दिल ये पुकारे … ,दिल तड़फ तड़फ के कह रहा … अजीब दास्ताँ है ये … हमने देखी  है इन आँखों की महकती खुशबू  … शामिल हैं .
                                   लता मंगेशकर  जी नई सदी में नई  ताजगी से आती हैं।  हल ही में उन्होंने एक पंजाबी एल्बम के लिए गाया  है। कुछ बरस पहले फिल्म पेज थ्री के लिए गाया गया  उनका एक सुमधुर गीत -"कितने अजीब रिश्ते हैं यहाँ पर …. " यह सिद्ध करता है कि  बढ़ती आयु का उनके गायन पर कोई अधिक प्रभाव नहीं पड़ा।  भारतीय सिनेमा की एक सदी पूरी होने पर भी उनका मन उल्लास से भर उठता है और वे  गीत गाने के  अनुरोध ठुकरा नहीं पातीं . एक तरफ हम देखते हैं कि  अभिनय से जुड़ी  वे अनेक नायिकाएं जिनके लिए ताई ने गाया ,अब जिन्दगी को अपने घर की चार दीवारी  में समेट  चुकी  हैं ,लेकिन लता जी कर्म में यकीन रखते हुए अपनी आराधना  में तल्लीन  हैं . आज भी मानो  वे गा  रही हों -अल्लाह तेरो नाम ,ईश्वर तेरो नाम … या फिर प्रभु तेरो नाम ,जो ध्याये ,फल पाये …. लता जी सर्वाधिक गीत गाने वाली गायिका और सबसे अधिक भाषाओ  में गाने का रिकॉर्ड बना चुकी हैं। यह कितनी सुखद और संतोष देने वाली बात है कि  उनका जज्बा कायम है.                                          
  चार -पांच  दशक तक लगातार हिंदी सिनेमा के लिए पार्श्व गायन कर अलग पहचान बनाने वाली प्रसिद्द पार्श्व गायिका लता जी के   लिए गाना एक इबादत है . इसलिए वे जब गीत गाती  हैं तब मन से एकाग्र  और सिर्फ अपने गायन  पर ध्यान देती हैं।  अपने पिता दीना नाथ मंगेशकर  का दिया आशीर्वाद  उनके साथ रहता है।  लता जी ने  ने गायन के लिए शब्दों के सही  उच्चारण  के लिए अनेक भारतीय  भाषाओ  में खुद को जानकार और  पारंगत बनाया . उन्होंने बंगाली , पंजाबी ,उर्दू ,सिंधी ,गुजराती  और मराठी भाषाओं  की तालीम भी  हासिल की .
                                                      इंदौर में  एक  अनोखा म्यूजियम भी है लता जी के नाम 
                   इंदौर शहर से कुछ दूरी पर पिगडम्बर  ग्राम में लता दीनानाथ मंगेशकर ग्रामोफोन रिकॉर्ड संग्रहालय  को श्री सुमन चौरसिया जी ने आकर्षक शक्ल                         देकर संजोया  है  लता जी के गाये गीतों के सभी रिकार्ड्स से ,बहुत से रिकॉर्ड तो  दुर्लभ   श्रेणी के हैं।  यहाँ अनेक पुस्तकें भी संग्रहीत हैं।  चौरसिया परिवार की संगीत के प्रति आत्मीय अभिरुचि का प्रतीक है ये संग्रहालय। यहाँ फिल्म लेखक , गीतकार , संगीतकार ,कलाकार आदि अक्सर  आते रहते हैं। यह एक शोध केंद्र भी बन चुका  है।   लता ज के साथ ही आशा भोसले जी और हृदयनाथ  मंगेशकर भी इस संग्रहालय को बहुत पसंद करते है. लता   जी खास अवसरों पर विशिष्ट  समारोहों के लिए  भी गाती  रही हैं . लेकिन अभी मध्य प्रदेश के स्थापना दिवस  समारोह में उनके स्वर गूंजना  बाकी  हैं । दरअसल  यह मध्य प्रदेश वासियों  के लिए एक विशेष अवसर होगा जब वे  ऐसे कार्यक्रम में उन्हें मौजूद पाएंगे। लता जी   को  मध्य  प्रदेश के लोगों  की भावना का  सम्मान करते हुए अब एक बार सार्वजानिक गायन के लिए अपने मध्य प्रदेश की धरती पर आ जाना चाहिए।  लता   जी   अपने गीत- गायन में शास्त्रीय शैली को अपनाने  के साथ - साथ  विशेष अंदाज में गाने वाली गायिका  मानी  जाती हैं और वे  अनेक  भाषाओ  में गाने का रिकॉर्ड बना चुकी हैं।  इस अवस्था में भी उनका जज्बा कायम है.लता   जी के   प्रति न सिर्फ करोड़ों  गीत -संगीत  प्रेमियों बल्कि आम लोगों  के मन में एक समर्पित गायिका ही नहीं एक आत्मनिर्भर , स्वाभिमानी भारतीय स्त्री की छवि के साथ विशेष  आदर भाव है. लता जी की बहन आशा जी को सुनने आए  नागरिक तब बहुत खुश हो गए थे जब उन्होंने भोपाल के कुदरती सौंदर्य के साथ ही इंदौर की तारीफ के पुल  बांधे और वहाँ  के  सराफा बाजार के व्यंजनों की  खास तौर  पर तारीफ की। चूँकि  लता जी का जन्म इंदौर का है ,इसलिए लता जी का मध्य प्रदेश में काफी आदर किया जाता है लेकिन   लता जी के साथ  ही उनकी छोटी बहन के नाते आशा जी को भी  मध्य प्रदेश के  नागरिक  बहुत   सम्मानीय मानते  हैं  . मध्य प्रदेश  के बाशिंदे  लता जी और आशा जी  सहित उनकी और बहनों  उषा जी , मीना  जी और भाई हृदयनाथ मंगेशकर   के लिए सेहतमंद बने रहने और सवा सौ साल जीने की कामना  करते हैं.
यह दिली इच्छा है लोगों की कि लता  जी  एक बार आएं  और अपने   प्रदेश  में गायें ।          यह आशा जी  और  लता जी के लिए और मध्य प्रदेश  के लिए बहुत अच्छा होगा और स्मरणीय भी  रहेगा  यदि दोनों बहनें  मध्य प्रदेश के और  नजदीक आ जाएँ। ऐसा लगता है मध्य प्रदेश लता जी को अब उतना आकर्षित नहीं कर पा  रहा।  शायद वे बच्चों  की तरह किसी छोटी सी बात पर अपने ही घर के सदस्यों से रूठ  गई  हैं।  यह कितना सुखद होगा कि    लता ताई मध्य प्रदेश आयें और यहा मन से  गीत गायें। मध्य प्रदेश के स्थापना दिवस के भव्य समारोह में जब तघन साल पहले आशा भोसले जी आ सकती हैं  तब  लता जी भी अपने जन्म प्रदेश में पधारें , यह लाखों -लाख लोगों  की ख्वाहिश है। वैसे भी घर की बुआ  या किसी बुजुर्ग का इस तरह  खामोश रहना ठीक नहीं।  इस दिशा में अब सामाजिक स्तर  पर ठोस पहल होना चाहिए। कोई असंभव नहीं कि  लता जी और  आशा जी के साथ एक मंच पर  ,मध्य प्रदेश आकर गायें। बस हमारा आत्मीय आग्रह हो और उन्हें ससम्मान आमंत्रित किया जाये ,इसकी जरुरत है। आशा जी  और  लता ताई ,भारत या एशिया की धरोहर  नहीं  बल्कि  विश्व स्तरीय  शख्सियत हैं। ये शब्द गीतकार हसरत जयपुरी के हैं  लेकिन  मानो  मध्य प्रदेश के लोग किसी बात पर  अपनों से ही रूठी  लता जी के लिए कह रहे हों - अजी  रूठकर अब कहाँ  जाईएगा , जहाँ जाईयेगा ,हमें  पाईयेगा..... लता जी  मध्य प्रदेश की इस धरती पर जरूर जल्द आएँगी और गाएंगी ,ये उनके चाहने वालों  का यकीन है ।  lataa ji birth day
28 september 2015

Saturday, September 26, 2015

विश्व हिंदी सम्मेलन के अवसर पर लेख में उल्लेख....
स्वर कोकिला के नाम पर अनूठा संग्रहालय है उनकी जन्म स्थली इंदौर में । कभी देखिए जरूर ।


चंडीगढ़ के लेखक श्री एस पी सिंह कब मेरे अजीज दोस्त बन गए ,पता नहीं चला।उनके आत्मीय आमंत्रण [पर पहुंचा था मैं। सिर्फ एक समानता कि दोनों ने अभिनेत्री साधना पर लिखा है , इस रविवार एस पी साहब की पुस्तक पर चर्चा गोष्ठी में शामिल होने का अवसर मिला। शहर की जो तारीफ सुनी थी उससे भी बेहतर महसूस किया , वहां अभी हल्की ठण्ड शुरू हो गई है , आने वाले dec. महीने में क्रिसमस और नए साल का जश्न रहेगा ,फिर जनवरी में चंडीगढ़ कार्निवाल जिसका सभी को इन्तजार रहता है। इसके बाद फ़रवरी में रोज़फेस्टिवल की धूम रहेगी। एक जिन्दा शहर। क़ला और साहित्य से गहरा सरोकार रखने वाले शख्स कई मिले जिनमें ना केवल साहित्य अकादमी के सचिव माधव जी ,दूरदर्शन के निर्देशक रत्तू साहब और तो और खाद्य मंत्री आदेश प्रताप सिंह कैरों भी शामिल हैं। इन सभी से खूब बातें हुईं। शहर की खामोश झील भी बहुत कुछ कहती नजर आई. रॉक गार्डन देखने का अपना अलग आनंद है.
चंडीगढ़ जो कभी मेरे लिए शहर था , अब एक याद है। 28 october 2014 

Friday, September 25, 2015

स्वतंत्रता आंदोलन में सिंध का महत्वपूर्ण योगदान
 जब अखंड भारत था ,सिंध प्रान्त अफगानिस्तान  और अरब के नजदीक सीमा पर स्थित होने के कारन आक्रामकों का निशाना रहा। सिंध पर राजा डाहर  के कुछ गद्दारों  की वजह से मुगलो ने कब्ज़ा किया जो कई सदियों तक रहा ,फिर अंग्रेज  जमे रहे। वर्ष 712  से लेकर 1947  तक हम गुलाम रहे। इस बीच पूरे देश की तरह सिंध प्रदेश भी आजादी के आंदोलन का अहम कार्य क्षेत्र रहा। 
                                   एक अखबार के आठ संपादकों  को कारावास 
 सिंध के एक अख़बार हिन्दू के एक के बाद एक करके आठ समपादको को जेल में बंद किया गया क्योंकि वे ब्रिटिश सत्ता का सीधा विरोध करते थे।  प्रमुख रूप से हरकिशन गुरदासमल , नाथूराम शर्मा , मंघाराम लुल्ला , नेनूराम शर्मा , हसाराम  पमनानी, नारायणदेव आर्य  सीतलदास भेरुमल , भगत कंवरराम  ऐसे सेनानी हैं जिन्होंने  राष्ट्र रक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। भारतीय सेना में  वायु और जल सेनाध्यक्ष एडमिरल तहलियानी साहस  के कारण  जाने गए। मुंबई में लेखक और क्रांतिकारी  कीरत बाबानी जिनकी आयु 91  वर्ष है सिंधु संस्कार को पूर्व में एक विशेष साक्षात्कार में आजादी की मुहीम में सिंधी भाइयो के योगदान के बारे में विस्तार से बता चुके  हैं।  0 अशोक मनवानी ( ब्लॉग बातें -मुलाकातें  ) 2013

Thursday, September 24, 2015

सागर के मोती 
कार्यक्रम बहुत होते हैं , स्थायी याद  कम कार्यक्रमों  की बन पाती  है . हर साल  भाई राजेश सागर बुलाता था ,कार्यक्रम का नाम होता -हंगामा -2011 ,हंगामा -2013 .. मैंने कहा जब यह नाम  बदलोगे ,आ जाऊँगा ,सो इस साल भाई मान गया (शायद बे-मन से ) मैंने एफ बी  और ई मेल से आये आमन्त्रण  पत्र पर,फिर से चेक करने की  आदत के मुताबिक  दोबारा  नजर डाली ,भाषा ठीक  थी ,कार्ड का आकल्पन  भी जमा ,फिर अपन ने सागर की  ट्रेन  पकड़ ली , रविन्द्र  भवन ,सागर पूरा भरा था . कार्यक्रम संचालन  का दारोमदार   छोटे भाई विजय ने सम्हाला , जानी -मानी  एंकर भोपाल की मेघा ठाकुर के साथ . बात कुछ जम  ही गई ... बच्चे ,किशोर  नए गीतों  पर नाचे  और घंटों गाते रहे ,ये तो ठीक रहा पर  एक बात ने मन को बहुत खुश किया -कार्यक्रम के बीच दो प्रतिभागियों के मध्य  लगने वाले समय का रचनात्मक उपयोग, वो भी सागर की शान बढ़ाने वालो के नामोल्लेख के साथ . विजय ने लम्बी श्रृंखला चला दी -मुझे गर्व है उस सागर पर जिसने डॉ हरिसिंह गौर जैसा दानवीर पैदा किया , सागर झील का निर्माता लाखा बंजारा ,ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी जैसा सेनानी ,भाई अब्दुल गनी  जैसा देशभक्त  पत्रकार ,गीतकार विट्ठल भाई पटेल .... कितने ही  शख्स याद किये गए ---भुवन भूषन देवलिया ,कवि  पदमाकर ,त्रिलोचन जी ,रमेश दत्त दुबे ,विजया राजे सिंधिया ,दादा डालचंद जैन ,गोवा  मुक्ति आंदोलन की  योद्धा  सहोदरा  राय ,अभिनेता गोविन्द नामदेव,संगीत साधक ओमप्रकाश चौरसिया ,हर्ष चतुर्वेदी ,रघु ठाकुर ,मुंशी प्रेमचंद की इकलौती  बेटी कमला देवी ...  मानो भावनाओं  का सागर उमड़ पड़ा हो … अपनी जमीन और जनता से जुड़े 50  से अधिक बेमिसाल लोगों की  याद ,बेहद श्रृद्धा  के साथ . और अतिथियों  के साथ ख्यात लोक नृत्य और कला निर्देशक (मेरे गुरु भी ) विष्णु पाठक जी भी मौजूद थे इन लम्हों  के . बधाई मेरे भाई राजेश मनवानी . 
 ( 9th feb 2014  को लिखा सागर में आयोजित कार्यक्रम का अनुभव )