Tuesday, January 12, 2016

एक सुनहरे दौर का चला जाना पच्चीस  दिसम्बर  के दिन सुबह ये खबर आई  कि  मुंबई में वरिष्ठ अदाकारा साधना जी नहीं रहीं।  एक पल को यकीन ही नहीं हुआ।  उन्हें कोई कैंसर नहीं था , जैसा अधिकांश टी वी चैनल बताते रहे।  मैं  साधना जी पर किताब लिखने के सिलसिले में उनसे जब भी मिला , भले कुछ क्षण मिले हों बातचीत के, हमेशा खुश और पॉजिटिव - ऊर्जा से ओत - प्रोत देखा। आम तौर  पर वे परिचित , निकट रिश्तेदारों  और खास प्रशंसकों से ही मिलती थीं। मैंने ट्रेन  से तुरंत भोपाल से  मुंबई रवाना होने का कार्यक्रम बना लिया , रिजर्वेशन न मिलने पर सोलह घंटे लम्बी बस यात्रा का विकल्प चुनना पड़ा।  शनिवार की सुबह  सांताक्रुज के राम कृष्ण  मार्ग के संगीता नामक  बंगले के ग्राउंड फ्लोर  बी - वन पहुँच गया। दिवंगत अभिनेत्री साधना जी के निवास पर सांताक्रुज इलाके में ऐसी भीड़ पहले कभी नहीं देखी  गई। साधना जी चूँकि कभी जनता के बीच नहीं आती थीं  इसलिए शायद उनके दीदार को तरसते उनके प्रशंसक बहुत   बेचैन और बेताब थे। व्यवस्था देख रही शाइना एन सी  और लोकल पुलिस किसी तरह उस हुजूम को समझाने  और उनके घर के भीतर आने से रोकने में लगे थे।  यहाँ  से ग्यारह बजे साधना जी की आखिरी यात्रा  निकली। अर्थी पर लेटी साधना जी का चेहरा उसी साधना कट हेयर स्टाइल के साथ दिखाई दिया , आँखों पर चश्मा चढ़ा था। एक जिंदगी  पूरी। एक अलग दुनिया की यात्रा के लिए तैयार।  देश - विदेश में जिसने हिंदी सिनेमा में लगातार अपनी विशेष स्थिति बनाकर  करोड़ों  प्रशंसक पैदा किए।  दस फैशन चलाए। सिर्फ साधना कट नहीं।  जान लीजिए नौ और फैशन  -  आँखों में तिरछा  काजल , शरारा , गरारा , टाइट और बिना बाहों वाला कुरता , चूड़ीदार सलवार या पायजामा , कानों में बड़े बाले , गले  में दुपट्टा ,   बालों  के आकर्षक जूड़े और सबसे खास उनकी सौम्य मुस्कान। याद दिलाएं आपको कि  एक मुसाफिर एक हसीना और वो कौन थी  जैसी फिल्मो की  लोकप्रियता का यह आलम था कि उस समय की  कॉलेज गर्ल्स  ने हंसना छोड़ दिया था , बस हल्की  मुस्कान चेहरों पर होती थी।  भारतीय सिनेमा का अहम दौर  रहा  साधना जी जैसी अभिनेत्रियों  की वजह से।  लता जी मानती हैं कि  साधना की तरह कई अहिन्दी भाषी अदाकाराओं का हिंदी  उच्चारण अद्भुत था।  राष्ट्रभाषा के लिए  उनका प्रेम प्रशंसनीय है। 
साधना जी के  शव वाहन  के पीछे गाड़ियों की लम्बी कतार  थी।  एक. दो टी वी चैनल्स  जो बता रहे थे की बॉलीवुड की कोई बड़ी हस्ती साधना जी के अंतिम दर्शन को नहीं पहुंची , यह असत्य था।  वेटेरन एक्टर संजय खान , संवाद लेखक निर्माता  सलीम खान ,  फिल्म इंतकाम और एक फूल दो माली में साधना जी के नायक रहे संजय खान ,  चरित्र अभिनेता   और साधना जी के  ख़ास प्रशंसक रजा  मुराद , काबिल गायक , द्घोषक , अभिनेता   अन्नू कपूर   प्रसिद्द कोरियोग्राफर  सरोज खान जिन्हें  पहली बार साधना जी ने गीता मेरा नाम फिल्म बनाने पर बतौर कोरियोग्राफर सम्मानित किया , पूर्व मिस इंडिया  पूनम चंदीरमानी  सिन्हा (  शत्रुघ्न  सिन्हा जी की पत्नी और पूर्व मिस इंडिया  ) साधना जी के नजदीकी श्री सुरेश लालवानी , रमेश सिप्पी जो पहले  बतौर  निज सहायक भी कुछ समय काम कर चुके हैं , आने- जाने वालों   से बात करते हुए सक्रिय  थे। इस बीच वेटेरन एक्ट्रेस और साधना जी की सहेली वहीदा रहमान और आशा पारेख जी भी आती  हैं - बेहद ग़मगीन थीं  दोनों।  मुझे  एक सिने प्रेमी  धर्मेन्द्र पाठक  भी मिले जो अहमदाबाद खास तौर  पर आए  थे , वे शांत और मायूस मेरे पास बैठे थे। मुंबई के ओशिवारा में जहां  हिन्दू शमशान भूमि  का बोर्ड लगा हुआ था,  शमशान घाट की बाऊन्ड्री  वॉल  के बाहर  ही टी वी वालों  ने ओबी वेन्स लगा रखी थीं। अंत्येष्टि की रस्म के लिए  रिश्तदारों में  साधना जी के दिवंगत पति आर के नैयर  के भाई केवल नैयर , भतीजी  गीता  साधना जी की शिमला निवासी ननद सोनिया , साधना जी के कसिन   विजय भावनानी उनके बेटे  यशीष  भावनानी मौजूद थे।  वहीं   जानी मानी उद्घोषिका तबस्सुम , करण  जौहर की माँ श्रीमती हीरू जौहर   लघु  फिल्म निर्माता टी मनवानी आनंद, बीते दौर की अभिनेत्री शम्मी , दीप्ति  नवल  आदि मौजूद थे। पंडित जी मन्त्र आदि पढ़े।  आधा घंटे के बाद  अपने दौर की इस विलक्षण अभिनेत्री का पार्थिव शरीर विद्युत  शव दाह  कक्ष में ले जाया जाता है।  सभी मौजूद लोगों  की आँखों से आसुंओ की धारा बह  निकलती है। बाद में साधना जी के  बंगले  पर  फिर से  हेलेन जी और सारिका और अन्य कई अभिनेत्रियों का आना- जाना लगा रहता है।  मैं नम आंखों से लौटता हूं । साधना जी के दौर को याद करते हुए । साधना जी को मरणोपरांत ही सही पद्म श्री या पद्म भूषण दिया जाना चाहिए। उनके अभिनय के क्षेत्र में  अप्रतिम योगदान और  नए प्रतिमान रचकर फिल्म उद्योग की दिशा बदलने के लिए। 
०अशोक मनवानी । 

Thursday, December 24, 2015

sadhna ji

Tuesday, December 15, 2015

              मास्टर चन्दर


·       15 दिसंबर 1907 को सिंध के ठारुशाह में जन्म .
·       पिता - श्री आसनदास जमींदार थे । बचपन से संगीत से लगाव रहा । उन्हें चाचाजी ने कलकत्ता से हारमोनियम खरीद कर   दिया ।
·        एक दिन संत कंवरराम जो महान गायक और समाजसुधारक थे, मास्टर चंदर की प्रस्तुति देखी और भविष्यवाणी की कि यह बालक एक दिन प्रख्यात गायक बनेगा ।
·        वर्ष 1932 में मास्टर चंदर का प्रथम रिकार्ड "" सुहिणा अर्ज आहे "" के नाम से आया ।
·       मास्टर चंदर ने जीवन में करीब 50 वर्ष गायकी को दिए । उन्होंने हिंदी और सिंधी फिल्मों में अभिनय भी किया । उन्होंने हिंदी फिल्म दिलारम और मौत का तूफान में अभिनय भी किया । बहुत कम होगों को जानकारी होगी फिल्म अछूत कन्या के लिए अभिनेत्री देविका रानी के अपोजिट मास्टर चंदर का चयन किया गया था  । बाद में यह भूमिका अशोक कुमार को मिल गई । मास्टर चंदर एक अच्छे कवि  और संगीत निर्देशक भी थे । उन्होंने उस दौर के प्रमुख गायकों भगत कंवरराम के अलावा स्वामी कुंदन , जीवन भाई ,  अल्लाहरक्खी , भगत मोहन, जारोभगत आदि के साथ गायन किया । मास्टर चंदर बहुत लोकप्रिय रहे और उनके कुछ गीत तो आज भी ऐसे बच्चे गाते हुए मिलते हैं जिन्होंने न कभी मास्टर चंदर को देखा होगा न ही उनके अभिनय से परिचत होगा ।
      यह भी एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि एचएमवी कंपनी के इतिहास में 7 प्रतिशत की रायल्टी लेने वाले मास्टर चंदर प्रथम गायक थे वरना कंपनी ने किसी को 5 प्रतिशत से अधिक रायल्टी नहीं दी थी । मास्टर चंदर देश विभाजन के बाद मुम्बई में आ बसे । उन्होंने वर्ष 1955 में एक विशेष गायन कार्यक्रम भी प्रस्तुत  किया ।  अपने लोक प्रिय होने के कारण वे दो देशों के मध्य सेतु बने रहे । 1960 और 1970 के दशक में उन्होंने विश्व के कई देशों में प्रस्तुतियां दी । वर्ष 1984 की 3 नवंबर की तारीख को मास्टर चंदर ने आखिरी सांस ली । उनके दो बेटे महेश चंदर और गोप चंदर  भी गायन से बहुत सक्रियता से जुड़े । मास्टर चंदर की 9 पुस्तकें प्रकाशित हैं जो उनके संगीत गुरु काका जीवतराम   मटाई , शाह साहब संगीत और लोक संगीत और आध्यात्मिक विषयों पर आधारित हैं । एक नन्हीं बालिका की कहानी को उस दौर में गाकर मास्टर चंदर ने महिला सशक्तिकरण के लिए उपयुक्त वातावरण बनाया जो बहुत दुर्लभ बात है । 

Friday, November 13, 2015

is diwali sirf ek phuljhadi jalayee.ek mitr ne chetaya ki pashu -pakshi bahut aahat hote hain in aawajo se.kuchh asar hota hai kisi ke kahne ka.

Saturday, November 7, 2015

वर्ष 1999 में सिंधी और 2014  में हिंदी कहानी संकलन। दोनों का नाम मौजूदगी। वही आवरण पृष्ठ। जयपुर में ख्यात सिंधी लेखकों  से करवाया था विमोचन। संयोग यह कि  पहले अजमेर में कथाकार श्री लखमी  खिलानी ने दादा कीरत बाबाणी  के साथ किया था विमोचन। प्रकाशक भी पुराने मित्र ज्ञान लालवाणी हैं। अधिकांश   पाठक जरूर अलग। 

Friday, November 6, 2015

मुंशी प्रेमचंद जयंती पर एक कार्यक्रम में लमही जाना हुआ जो बनारस शहर से लगा हुआ गांव  है .report
 डॉ नारायण  सामताणी जी बनारस में रहते हैं। कुछ माह पहले भेंट हुई। बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी में बौद्ध अध्ययन विभाग से सेवानृवित्त  हैं। उन्होंने  संस्कृत को  पाली से अलग किया। अलग विभाग बना। आज भी 93  की आयु में मस्तिष्क गतिमान है। दादा को अमेरिका से आमंत्रण आते हैं। व्याख्यान और शोध निर्देशन के लिए.



डॉ नारायण सामताणी के साथ    बनारस में एक मुलाकात की तस्वीर 
31  जुलाई 2015





















 हार्दिक शुभकामनाएं। 

Tuesday, October 13, 2015

माउंटनमैन  मांझी  की भावना
नवरात्रि  पर्व  पर अनेक प्रख्यात मंदिर जनता की श्रद्धा के केंद्र होते हैं। यहाँ इंतजाम भी जरुरी हो जाते हैं , खासकर जब पहले  कोई  हादसा हुआ हो , तब प्रशासन की पहली प्राथमिकता  यही होती है कि श्रद्धालुओं को तकलीफ न हो , ऐसी व्यवस्थाएं कर ली जाएँ। दतिया जिले के रतनगढ़  में बहुत कम समय में प्रशासन ने रास्ता चौड़ा और सुविधाजनक बनवाने में कामयाबी हासिल की है। यह कहना शायद अतिश्योक्ति हो  लेकिन सच भी है कि यह काम लगभग उसी तरह का है जिस तरह अकेले मांझी ने बिहार में आम जन  की सहूलियत के लिए बरसों  पहले अपनी मेहनत  से  सुगम मार्ग निर्मित कर लिया था।  भले प्रशासन की इतनी तारीफ करना किसी को उचित न लगे लेकिन   यह तो कह ही सकते हैं   कि आज सभी साधनों  का इस्तेमाल कर प्रशासन ने  माउंटनमैन  मांझी  की भावना से काम किया है। मैंने कल (12 october 2015 ) रतनगढ़ जाकर  माता के दर पर माथा टेका और साक्षी बना  शानदार इंतजामों का ।  0 अशोक मनवानी